महिलाओं को सशक्त करती मराठी काव्य की अग्रदूत सावित्रीबाई फुले

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महिलाओं को सशक्त बनाने के लिए आधुनिक मराठी काव्य की अग्रदूत सावित्रीबाई फुले की आज 187 वीं सालगिरह है. सावित्री बाई फुले को भारत की प्रथम महिला शिक्षिका, समाज सुधारिका एवं मराठी कवयित्री माना जाता है. इन्होंने पुराने रीति रिवाजों की बेड़ियों को तोड़कर आधुनिक समय के अनुसार शिक्षा ग्रहण करके ना सिर्फ समाज की कुरीतियों को हराया, बल्कि भारत में लड़कियों के लिए शिक्षा के दरवाजे खोलने का काम किया.

अपनी शिक्षा की उपल्बधियों को पूरा करने के साथ साथ ही उन्होंने कई बाधाओं को पार करते हुए स्त्रियों को शिक्षा दिलाने के अपने संघर्ष में बिना धैर्य खोये और आत्मविश्वास के साथ डटी रहीं और सफलता प्राप्त की.सावित्रीबाई फुले ने अपने पति ज्योतिबा के साथ मिलकर उन्नीसवीं सदी में स्त्रियों के अधिकारों, शिक्षा छुआछूत, सतीप्रथा, बाल-विवाह तथा विधवा-विवाह जैसी कुरीतियां और समाज में फैले अंधविश्वास के खिलाफ संघर्ष किया.

कौन है सावित्रीबाई फुले
सावित्रीबाई का जन्म 3 जनवरी 1831 को महाराष्ट्र के सतारा जिले के नायगांव गांव में हुआ था, सिर्फ 9 साल की उम्र में उनकी शादी ज्योतिबा फुले के साथ कर दी गई. विवाह के समय सावित्री बाई फुले की कोई स्कूली शिक्षा नहीं हुई थी. सावित्री को पढ़ने की बहुत इच्छा थी, लेकिन घरवालों ने इसमें साथ नहीं दिया. रुढ़ी वादी समाज़ से लोहा लेने के कारण ज्योतिबा ने सावित्रीबाई को पढ़ाना जारी रखा और उनका दाखिला एक प्रशिक्षण विद्यालय में कराया. समाज के जरिए इसका बहुत विरोध होने के बावजूद सावित्रीबाई ने अपना अध्ययन पूरा किया.

शिक्षा ग्रहण करने के बाद सावित्री बाई ने अन्य महिलाओं को भी शिक्षित करने का जिम्मा उठाया और ज्योतिबा के साथ मिलकर 1848 में पुणे में बालिका विद्यालय की स्थापना की, जिसमें कुल नौ लड़कियों ने दाखिला लिया और सावित्रीबाई फुले इस स्कूल की प्रधानाध्यापिका बनीं। इसके बाद रास्ते आसान होते चले गए और उन्होंने भारत में लड़कियों और महिलाओं को शिक्षा के अधिकार के साथ अन्य मूलभूत अधिकार दिलाने की भी लड़ाई लड़ी.

सावित्रीबाई ने अपने जीवन को एक मिशन की तरह से जीया जिसका उद्देश्य था विधवा विवाह करवाना, छुआछूत मिटाना, महिलाओं की मुक्ति और दलित महिलाओं को शिक्षित बनाना. वे एक कवियत्री भी थीं उन्हें मराठी की आदिकवियत्री के रूप में भी जाना जाता था

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