संसद ने तीन तलाक प्रथा पर रोक लगाने वाले विधेयक को दी मंजूरी , बिल बनने की दिशा में बढ़ा

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सोमवार को संसद में चली लंबी  बहस के चलते मुस्लिम महिलाओं को तीन तलाक देने की प्रथा पर रोक लगाने के प्रावधान वाले एक ऐतिहासिक विधेयक को मंगलवार को मंजूरी दे दी. विधेयक बनने के बाद अब तीन तलाक का अपराध सिद्ध होने पर संबंधित पति को तीन साल तक की जेल का प्रावधान किया गया है.

बता दें कि लोकसभा में यह बिल एक दिन पहले यानी सोमवार को पारित हो चुका था जिसके बाद  इस विधेयक को कानून की शक्ल लेने के लिए राज्यसभा में पास होने की दरकार थी, जिसे मंगलवार को 99 सांसदों की रजामंदी मिलने के साथ ही यह बिल एक कानून बनने की ओर एक कदम अग्रसर हो चला है.

बता दें कि मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) विधेयक को राज्यसभा ने 84 के मुकाबले 99 मतों से पारित  किया गया. लोकसभा इसे पहले ही पारित कर चुकी है. इससे पहले भी उच्च सदन ने विधेयक को प्रवर समिति में भेजने के विपक्षी सदस्यों के जरिए लाये गये प्रस्ताव को 84 के मुकाबले 100 मतों से खारिज कर दिया गया था.  विधेयक पर लाये गये कांग्रेस के दिग्विजय सिंह के एक संशोधन को सदन ने 84 के मुकाबले 100 मतों से खारिज कर दिया.

विधेयक पारित होने से पहले ही जदयू एवं अन्नाद्रमुक के सदस्यों ने इससे विरोध जताते हुए सदन से बहिर्गमन किया.

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रविशंकर प्रसाद ने बिल के पक्ष में क्या कहा

वहीं सरकार की तरफ से इस बिल को पेश कर रहे विधि एवं न्याय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा कि भारत की मुस्लिम महिलाओं को इस प्रथा से काफी कुछ सहना पड़ रहा है. देश में  तकरीबन 2017 में 574 मामले  इस बिल के पेश होने से पहले और 2018 के आकंडों  के मुताबिक तलाक बिल पेश होने पर  लगभग 300 के करीब मामले सामने आए थे और ध्यान देने वाली बात है इनमें सबसे ज्यादा मामले यूपी से तकरीबन 74  मामले सामने आएं थे. साथ ही उन्होनें कहा अगर यह बिल आज पास नहीं होता तो ना जाने और कितने मामले ऐसे है जो सामने नहीं आ पाएंगे. इन आकंडों को जुटाना काफी मुश्किल था इन्हें टीवी, अखबार व लोगों की मदद से जुटाएं गए है. अगर यह बिल कानून का रुप नहीं लेता तो  300 के आकंडों को 500 के आकंडे बनने में देर नहीं होगी.

इसके अलावा उन्होनें एक पेशेवर मुस्लिम आईटी  महिला का उदाहरण देकर कहा कि तीन बेटियों के जन्म के बाद उसके पति ने उसे एसएमएस से तीन तलाक कह दिया था. ऐसे में  वह जब मेरे पास न्याय की दरकार लेने आई तो मैं उससे क्या कहता क्योंकि कानून और धर्म से मेरे हाथ बंधे . क्या यह कहता कि उच्चतम न्यायालय के निर्णय को मढ़वा कर रख लो. अदालत में अवमानना का मुकदमा करो. पुलिस कहती है कि हमें ऐसे मामलों में कानून में अधिक अधिकार चाहिए.’’

इसके अलावा इस बिल के पक्ष में कहते हुए कहा कि शाहबानो मामले में उच्चतम न्यायालय के फैसले को पलटने के लिए पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की सरकार द्वारा लाये गये विधेयक का जिक्र करते हुए कहा, ‘‘ मैं नरेन्द्र मोदी सरकार का कानून मंत्री हूं, राजीव गांधी सरकार का कानून मंत्री नहीं हूं.’’  उन्होंने कहा कि यदि मंशा साफ हो तो लोग बदलाव की पहल का समर्थन करने को तैयार रहते हैं.

प्रसाद ने कहा कि जब इस्लामिक देश अपने यहां अपनी महिलाओं की भलाई के लिए बदलाव की कोशिश कर रहे हैं तो हम तो एक लोकतांत्रिक एवं धर्मनिरपेक्ष देश हैं, हमें यह काम क्यों नहीं करना चाहिए?

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उन्होंने कहा कि तीन तलाक से प्रभावित होने वाली करीब 75 प्रतिशत महिलाएं गरीब वर्ग की होती हैं. ऐसे में यह विधेयक उनको ध्यान में रखकर बनाया गया है.

प्रसाद ने कहा कि हम ‘‘सबका साथ सबका विकास एवं सबका विश्वास’’ में भरोसा करते हैं और इसमें हम वोटों के नफा नुकसान पर ध्यान नहीं देंगे और सबके विकास के लिए आगे बढ़ेंगे और उन्हें (मुस्लिम समाज को) पीछे नहीं छोड़ेंगे.

मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) विधेयक में यह भी प्रावधान किया गया है कि यदि कोई मुस्लिम पति अपनी पत्नी को मौखिक, लिखित या इलेक्ट्रानिक रूप से या किसी अन्य विधि से तीन तलाक देता है तो उसकी ऐसी कोई भी ‘उद्घोषणा शून्य और अवैध होगी.’

इसमें यह भी प्रावधान किया गया है कि तीन तलाक से पीड़ित महिला अपने पति से स्वयं और अपनी आश्रित संतानों के लिए निर्वाह भत्ता प्राप्त पाने की हकदार होगी. इस रकम को मजिस्ट्रेट निर्धारित करेगा.

प्रसाद के राज्यसभा में बिल के लिए न्यायोचित पक्ष रखने के बाद बिल को 99 मतों से पास कर दिया पर अब देखना है कि क्या बिल के पास होने भर से ही मुस्लिम महिलाओं की हालत में सुधार हो पाएगा . या  सिर्फ 30 जुलाई एक ऐतिहासिक बिल को पास करने वाली तारीख के रुप में याद की जाती रहेंगी.

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