हजरत इमाम हुसैन की शहादत का महीना मुहर्रम

मुहर्रम (Muharram) का त्योहार मुस्लिम समुदाय के लोगों के लिए एक खास अहमियत रखता है. इस दिन को पैगम्बर मुहम्मद के नाती हजरत इमाम हुसैन की शहादत के रूप में मनाया जाता है

मुहर्रम (Muharram) का त्योहार मुस्लिम समुदाय के लोगों के लिए एक खास अहमियत रखता है. इस दिन को पैगम्बर मुहम्मद के नाती हजरत इमाम हुसैन की शहादत के रूप में मनाया जाता है.  जिसे इस्लामिक कैलेंडर (Islamic Calender) में पहला महीना भी माना गया है. कहते हैं कि इसी महीने को इस्लाम कैलेंडर के 4 महीनों में शामिल किया गया है.

इसे महीने के 10वें दिन मनाया जाता है जिसे ‘आशुरा’ (Ashura) भी कहा जाता है. इस दिन को मातम (Mourn day) का दिन इसलिए भी कहा गया है क्योंकि हजरत रसूल के नवासे हजरत इमाम हुसैन और उनके परिवार वालों को करबला के मैदान में शहीद किया गया था. उसी की याद में मुहर्रम का यह खास दिन मनाया जाता है.

क्या थी करबला की जंग

करबला, इराक की राजधानी बगदाद से 100 किलोमीटर दूर उत्तर-पूर्व में एक छोटा-सा कस्बा है. 10 अक्टूबर 680 (10 मुहर्रम 61 हिजरी) को यह लड़ाई समाप्त हुई थी .इसमें एक तरफ 72 (शिया मत के अनुसार 123 यानी 72 मर्द-औरतें और 51 बच्चे शामिल थे) और दूसरी तरफ 40,000 की सेना थी. हजरत हुसैन की फौज के कमांडर अब्बास इब्ने अली थे. उधर यजीदी फौज की कमान उमर इब्ने सअद के हाथों में थी. जाहिर तौर पर इब्न ज़्याद के कमांडर शिम्र ने हज़रत हुसैन और उनके सभी 72 साथियों (परिवार वालो) को शहीद कर दिया था. जिसमें उनके छः महीने की उम्र के बेटे हज़रत अली असग़र भी शामिल थे. और तभी से तमाम दुनिया के ना सिर्फ़ मुसलमान बल्कि दूसरी क़ौमों के लोग भी इस महीने में इमाम हुसैन और उनके साथियों की शहादत का ग़म मनाकर उनकी याद करते हैं.

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