ठसक के साथ लिखना और स्त्रीवादिता को मुखरता से लाने वाली लेखिका कृष्णा सोबती का निधन

ये शब्‍द ही हैं, जो मरने के बाद भी जिंदा रहते हैं… इसलिए कभी धीमे मत बोला करो. हमारी आवाज में ठसक होनी चाहिए. शब्दों के भावों को जीना और जीकर उनका साहित्य सृजन कर हिंदी के पाठकों तक पहुंचाना, ताकि वह भी उन शब्दों से रुबरु हो सके. साहित्यलेखन में स्त्रीवादिता को मुखरता से लाने वाली आवाज की लेखिका कृष्णा सोबती का निधन हो गया.

18 फरवरी को गुजरात में जन्मी लेखिका ने भारत विभाजन के दंश को सहने के बाद वह दिल्ली में रहकर साहित्य जगत में अपना योगदान देने लगी, जिसके कारण उन्हें1980 में ‘ज़िन्दगीनामा’ के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार व 2017 में ज्ञानपीठ पुरस्कार से भी नवाज़ा गया.

लेखिका कृष्णा सोबती ने हमेशा अपनी रचनाओं में महिला सशक्तिकरण और स्त्री जीवन की जटिलताओं का जिक्र किया था. सोबती को राजनीति-सामाजिक मुद्दों पर अपनी मुखर राय के लिए भी जाना जाता है.

कृष्‍णा का लेखन हमेशा वक्‍त से आगे रहा, पर उनका लेखन हमेशा संयमित रहा. अपने कालजयी उपन्यास ‘मित्रो मरजानी’ में उन्होंने अपने बेलौस संवाद के जरिए कथा-भाषा को एक विलक्षण ताजगी दी. सूरजमुखी अंधेरे के, डार से बिछुड़ी, जिंदगीनामा, दिलोदानिश, समय सरगम आदि में उन्होंने कथा को अप्रतिम ताजगी और स्फूर्ति प्रदान की. उनकी लंबी कहानी ‘ए लड़की’ का स्वीडन में नाट्य मंचन भी हुआ.

वे जब तक वे लिखने-पढ़ने में समर्थ रहीं युवाओं का लेखन पढ़ती रहीं. उन्‍होंने बताया कि युवाओं के लेखन से बीत रहे समय का पता चलता है।.आप समय के साथ कदम मिला पाते हैं. पर समय के साथ कदम मिलाने वाली यह मुखरता की आवाज भरी लेखनी का निधन आज लंबी बिमारी के चलते दिल्ली में हो गया.

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