खुदा कि राह में कुर्बान करने का सही मतलब है ईद-उल-अज़हा (बकरीद)

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रमजान के पवित्र महीने की समाप्ति के लगभग 70 दिनों बाद आने वाली ईद को ईद-उल-अज़हा (बकरीद) कहा जाता है, इस्लामिक मान्यता के अनुसार हज़रत इब्राहिम अपने पुत्र हज़रत इस्माइल को इसी दिन खुदा के हुक्म पर खुदा कि राह में कुर्बान करने जा रहे थे, तो अल्लाह ने उसके पुत्र को जीवनदान दे दिया जिसकी याद में यह पर्व मनाया जाता है. भारत, पाकिस्तान व बांग्ला देश में इसे ‘बकरा ईद’ बोलते हैं.

ईद उल अजहा का त्यौहार हिजरी के आखिरी महीने जुल हिज्ज में मनाया जाता है. पूरी दुनिया के मुसलमान इस महीने में मक्का सऊदी अरब में एकत्रित होकर हज मनाते है. ईद उल अजहा भी इसी दिन मनाई जाती है.

इस त्योहार को लेकर मान्यता है कि हजरत इब्राहीम ने एक स्वप्न देखा था जिसमें वह अपने पुत्र इस्माइल की कुर्बानी दे रहे थे. हजरत इब्राहीम अपने दस वर्षीय पुत्र इस्माइल को ईश्वर की राह पर कुर्बान करने निकल पड़े.  कहा जाता है कि ईश्वर ने अपने फरिश्तों को भेजकर इस्माइल की जगह एक जानवर की कुर्बानी करने को कहा. दरअसल इब्राहीम से जो असल कुर्बानी मांगी गई थी, वह थी उनकी खुद की थी जिसमें वह अपने सुख-आराम को भुलाकर खुद को इंसानियत की सेवा में पूरी तरह से लगा दे. इसके लिए उन्होनें अपने पुत्र इस्माइल और उनकी मां हाजरा को मक्का में बसाने का निर्णय लिया.

मक्का उस समय रेगिस्तान के सिवा कुछ न था. उन्हें मक्का में बसाकर वे खुद मानव सेवा के लिए निकल गये. इस तरह एक रेगिस्तान में बसना उनकी और उनके पूरे परिवार की कुर्बानी थी जब इस्माइल बड़े हुए तो उधर से एक काफिला (कारवां) गुजरा और इस्माइल का विवाह उस काफिले (कारवां) में से एक युवती से करा दिया गया फिर प्ररांम्भ हुआ एक वंश जिसे इतिहास में इश्माइलिट्स, या वनु इस्माइल के नाम से जाना गया.

हजरत मुहम्मद साहब का इसी वंश में जन्म हुआ था. ईद उल अजहा के दो संदेश है पहला परिवार के बड़े सदस्य को स्वार्थ के परे देखना चाहिए और खुद को मानव उत्थान के लिए लगाना चाहिए ईद उल अजहा यह संदेश याद दिलाता है कि कैसे एक छोटे से परिवार में एक नया अध्याय लिखा गया.

इसी अध्याय और संदेश को लेकर आज के दिन सभी देशोंमें रह रहे मुस्लिम समुदाय के लोगों में बड़े हर्ष उल्लास के साथ मनाई जाती है.

 

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