श्रद्धांजलिः तिरंगा फहरा हुआ ही शानदार लगता है. लिपटा हुआ तो गमगीन नज़र आता है!

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चाह नहीं, देवों के सिर पर
चढ़ूँ भाग्य पर इठलाऊँ।
मुझे तोड़ लेना वनमाली!
उस पथ पर देना तुम फेंक,
मातृभूमि पर शीश चढ़ाने
जिस पथ जावें वीर अनेक
माखनलाल चतुर्वेदी की इस कविता का मर्म आज देश के हर व्यक्ति को समझ आ रहा होगा क्योंकि एक बार फिर से देश के जवान जिनकी वजह से हम चैन की नींद सोते है, जो दिन रात देश की पहरेदारी पर तैनात है. सिर्फ इसलिए की देश की जनता चैन की नींद सो सके. उनकी जिंदगियों को फिर से एक बार आतंवादियों ने अपने हाथों से मसला सिर्फ इसलिए की वह देश की सुरक्षा पर हंस सके. पर इन आतंवादियों को यह नहीं मालूम की जिस देश के एक जवान को वो मारेंगे, वहां हर गली से एक जवान देश के लिए जान न्योछावर करने के लिए निकलेगा.

भारत देश का हर व्यक्ति अपने देश के लिए मर मिटने का रुतबा रखता है. क्योंकि जब जब सरहद पर हमारे जवान शहीद हुए, तब -तब देश के हर इंसान ने उनके लिए एक सुर में आवाज़ उठाई है और मांग की खून का बदला खून. क्योंकि शहीदों की शहादत का मंज़र हमें बार -बार नहीं देखना. जान की परवाह किए बगैर माइनस डिग्री की सर्दियों में यह जवान अपनी जान की परवाह किए बगैर तटस्थ भावों से अपने कर्तव्य का निर्वाहन करता है और ज्यादातर इसी कर्तव्य का निर्वाहन करते हुए वीरगति को भी प्राप्त हो जाते और पीछे रह जाता है उनके घर में उनका परिवार. जो उनकी शहादत पर आसूं भी नहीं बहा सकता क्योंकि आसूं बहाएंगा तो उनकी शहादत शर्मसार होगी. क्योंकि वो किसी कार एक्सीडेट या रोड हादसे का शिकार नहीं हुए बल्कि उन्हें तिरंगे में लिपटी ऐसी शहादत नसीब हुई, जो विरलों को ही मिलती है.

पर अपने पीछे छोड़ गए उस रिश्तो और उन परिवारवालों का क्यां, जो एक पल में ही उनसे जुदा हो गए. ऐसा ही हाल कल हुए जम्मू कश्मीर के पुलवामा में सीआरपीएफ के काफिले पर हुए आतंकवादी हमलों में मारे गए शहीदों के घर का है. उन घरों में किसी का बाप उम्र की दहलीज के उस मोड़ पर खड़ा है, जहां वो अपने बेटे के कंधें पर जाने की राह देख रहा है, पर अब बेटा जाएंगा बाप के बूढ़े कंधों पर तिरंगे में लिपटा हुआ. किसी की मां अपने बेटे की शादी के सपने सजाएं बैठी थी की बेटा आएं, तो बहूं आएं पर, उसे क्या पता था बेटा तो आएगा पर तिरंगे की चादर में लिपटा हुआ. पत्नी, पति की राह देखती है कि पति आएं तो, बेटी के हाथ पीले करें. पर अब बेटी के हाथ पीले होने से पहले ही उसे अपने हाथों की महंदी का रंग सुर्ख लाल होते देखना पड़ेगा.

ये मंज़र होगा आज उन शहीदों के घर का, जिनके घर में कल से भीड़ है पर यह भीड़ किसी त्योहार पर अपनों से मिलने की नहीं, बल्कि नम आखों से अपने नौजवान वीर सैनिकों के पार्थिव शरीर को नम आंखों से विदा करने के लिए होगी .

हम अब यह पूछना चाहते यह मंज़र उन मां- बाप, भाई .पत्नि औप बेटियों को कब तक देखना होगा? क्या सरकार अब भी नहीं चेतेगी , क्योकि जुबानी वादे बहुत हो चुके, अब वक्त है इन मंज़रों को फिर से ना दोहराने का क्योंकि तिरंगा फहरा हुआ ही शानदार लगता है. लिपटा हुआ तो गमगीन नज़र आता है क्योंकि वो भी रोता है अपने वीर सपूतों की शहादत पर.

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